Khushiyan - Connecting Helping Hands
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when i met asharan home children

हाँ कल ही जैसे –
लड़ रहा था मैं खुदसे ,
मासूमियत के सिर्फ निशाँ थे,
आशरण की एक पहल पे ,
खुशिया बिखरने –
हम चल दिए , घूमनाम अजनबियों से ,
कुछ आवाजें बहोतहात तन्हा दिखी ,
माँ का अभाव , पिता का स्नेह ,
पर हाँ रोशनआरा सा हर चिराग़ था ,
जानता हो बचपन से –
खुशियाँ क्या होती हैं ,
एक स्पर्श , एक मिलन ,
जैसे हम तुम मिले थे ,
एक पैगाम के तहत ,
कि जिंदगी , सूरज की किरणों सी है ,
जो सिर्फ पता तलाशती है ,
खुद के अंदर जीने का |

आशीष शर्मा – Author/Writer at The Wind Of a Poet

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Ashish Sharma

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